दुर्ग, जीवन में कई बार ऐसा मोड़ आ जाता है जब खुशहाल जिंदगी अचानक दुखों के अंधेरे में डूब जाती है। कसही गांव की रहने वाली श्रीमती रमला बाई पटेल के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। 3 सितंबर 2025 का दिन उनके परिवार के लिए काल बनकर आया, जब उनके पति श्री हुबलाल पटेल का अचानक निधन हो गया। पति के चले जाने से न केवल रमला बाई पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा, बल्कि घर का कमाने वाला सदस्य खो देने से परिवार के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया। रोजमर्रा की जरूरतों और जीवन यापन को लेकर अनिश्चितता छा गई। अधिक पढ़ी-लिखी न होने के कारण रमला बाई को सरकारी योजनाओं के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।
ऐसे कठिन और निराशाजनक समय में ग्राम पंचायत कसही की सरपंच संकटमोचक बनकर उभरी। सरपंच श्रीमती योगेश्वरी गायकवाड़ और ग्राम पंचायत सचिव खुद रमला बाई के घर पहुंचे। उन्होंने न केवल दुखी परिवार को ढांढस बंधाया, बल्कि ’राष्ट्रीय परिवार सहायता योजना’ के बारे में विस्तार से बताया। जब रमला बाई के बीपीएल रिकॉर्ड देखा गया तो उनका नाम बीपीएल सर्वे वर्ष 2002-03 में दर्ज पाया गया। इसके बाद पंचायत प्रतिनिधियों ने खुद पहल करते हुए फॉर्म भरने से लेकर जरूरी कागजी कार्यवाही तक पूरी मदद की।
*दफ्तरों के चक्कर से मिली मुक्ति, बैंक खाते में आई राशि*
आमतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को लगता है कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए जनपद या जिला पंचायत कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ेंगे। लेकिन रमला बाई को इस कार्य के लिए बाहर नहीं जाना पड़ा और ग्राम पंचायत स्तर पर ही सारा काम समय पर पूरा हो गया। आवेदन की प्रक्रिया पूरी होते ही योजना के तहत 20 हजार रुपये की आर्थिक सहायता सीधे रमला बाई के बैंक खाते में स्थानांतरित कर दी गई। रमला बाई ने कहा कि जब कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था, तब यह राशि वर्तमान जरूरतों को पूरा करने में बहुत बड़ी मददगार साबित हुई। मुझे ब्लॉक या जिला मुख्यालय की दौड़ नहीं लगानी पड़ी, सब कुछ गांव में ही हो गया। इसके लिए मैं अपनी ग्राम पंचायत और छत्तीसगढ़ शासन का दिल से आभार मानती हूँ।



