गौ तीर्थ बानबरद जहां आज भी गौ हत्या के पाप से मिलती है मुक्ति, 1 फरवरी से माघी पूर्णिमा मेला

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राकेश जसपाल की रिपोर्ट—-

दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड अंतर्गत नंदिनी थाना क्षेत्र में स्थित ग्राम बानबरद पूरे छत्तीसगढ़ में एक विशिष्ट धार्मिक पहचान रखता है। मान्यता है कि यहां गौ हत्या जैसे महापाप से भी मुक्ति मिलती है, इसी कारण इसे गौ तीर्थ कहा जाता है। गांव में स्थित चतुर्भुजी श्री विष्णु मंदिर, पाप मोचन कुंड एवं गतवा तालाब श्रद्धालुओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार द्वापर युग में यह क्षेत्र बाणासुर की नगरी था, जिसे पहले श्रोणितपुर कहा जाता था। श्रीकृष्ण के साथ युद्ध के दौरान गायों की मृत्यु से बाणासुर को गौ हत्या का पाप लगा। शिवजी की उपासना के बाद उन्हें विष्णु प्रतिमा निकालकर पूजन एवं कुंड स्नान करने का निर्देश मिला। माघ पूर्णिमा के दिन प्रायश्चित करने से उसे पाप मुक्ति मिली। तभी से यहां माघी पूर्णिमा पर पाप मुक्ति का विशेष महत्व है।
आज भी गौ हत्या के पाप से प्रायश्चित हेतु लोग यहां आते हैं। पहले यह प्रक्रिया 21 दिनों की होती थी, जो समय के साथ घटकर अब 7, 5 या 3 दिनों में पूरी की जा रही है। श्रद्धालु कुंड या गतवा तालाब में स्नान कर मंदिर में हवन-पूजन एवं दान-दक्षिणा करते हैं।
यहां स्थित 16–17वीं शताब्दी का चतुर्भुजी विष्णु मंदिर पाषाण कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। नगर पालिका द्वारा कुंड का नवीनीकरण कर इसे पाप मोचन कुंड का स्वरूप दिया गया है। कुंड के पास दुर्लभ अकोल वृक्ष भी स्थित है, जिसे समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
हर वर्ष माघी पूर्णिमा के अवसर पर बानबरद में विशाल मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। झूले, सर्कस, मौत का कुआं जैसे मनोरंजन के साधन आकर्षण का केंद्र रहते हैं। श्रद्धालु गतवा तालाब में स्नान कर मंदिर दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
गांव में खुदाई के दौरान गुप्तकालीन स्वर्ण सिक्के मिलने के बाद शासन द्वारा खुदाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। ग्रामीणों का मानना है कि बानबरद की धरती के नीचे कोई प्राचीन वैभवशाली नगर दबा हो सकता है।
इस वर्ष माघी पूर्णिमा के अवसर पर 1 फरवरी से बानबरद मेला प्रारंभ होगा, जिसकी तैयारियां मेला समिति एवं प्रशासन द्वारा पूरी कर ली गई हैं।

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