ग्राम महुदा में दश दिवसीय रामकथा का आयोजन किया जा रहा है जिसमे नन्हे से बालिका सुश्री अंशिका देवी के मुखाग्रौ से आज षष्ठम दिवश का रामकथा सम्पन्न हुआ जिसमे अंशिका देवी ने रामवणवाश कथा को विस्तार से बताया कि त्रेता युग में जब भगवान राम वनवास गए थे. उनके साथ माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण भी थे. अंशिका ने बताया कि माता कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वचन मांगे थे, जिसमें पहला अपने पुत्र भरत के लिए राजगद्दी और दूसरा भगवान राम को 14 वर्षों के लिए वनवास था, लेकिन हिंदू धर्म शास्त्रों में भगवान राम के वनवास को सिर्फ माता कैकेयी के वरदान का परिणाम नहीं माना जाता है, बल्कि इसके पीछे कई दूसरे कारण और पूर्व जन्मों के कर्म भी हैं. जैसे राजा दशरथ को मिला श्राप भी है. उसी श्राप के परिणामस्वरूप जिसकी वजह भगवान राम वन जाने को मजबूर हुए.
श्रीमद्भागवतम् के अनुसार, एक बार राजा दशरथ शिकार के लिए जंगल गए थे. राजा दशरथ को शब्दभेदी बाण चलाना आता था. वो सिर्फ आवाज सुनकर निशाना लगा सकते थे. एक बार उन्हें पानी भरने की आवाज सुनाई पड़ी.उन्होंने सोचा कि कोई जंगली जानवर पानी पी रहा है. इसके बाद उन्होंने उस दिशा में शब्दभेदी बाण छोड़ दिया. नदी में श्रवण कुमार अपने माता-पिता के लिए पानी भर रहे थे. राजा दशरथ का बाण श्रवण कुमार को जा लगा. इसके बाद राजा दशरथ श्रवण कुमार के पास पहुंचे, लेकिन तब तक उनकी मृत्यु हो चुकी थी. इसके बाद अपने बेटे की मृत्यु से दुखी श्रवण कुमार के माता पिता ने राजा दशरथ को श्राप दे दिया. कहा कि जिस तरह हम पुत्र वियोग में तड़प-तड़प कर अपने प्राण त्याग रहे हैं, उसी तरह तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग में ही होगी. श्राप के अनुसार ही राजा दशरथ की मृत्यु पुत्र वियोग में ही हो सकती थी. माता कैकेयी के द्वारा भगवान के 14 सालों का वनवास मांगने के बाद प्रभु राम को अयोध्या छोड़नी पड़ी. इसी पुत्र वियोग के कारण राजा दशरथ के प्राण निकल गए जिसके बाद केवट राज की कथा चित्रकुट का विस्तार प्रसंग और आरती पश्चात कथा विराम हुआ







